राजनांदगांव। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक चेतना और लोकहित की परंपरा के प्रतीक रहे वैष्णव शासक राजा दिग्विजय दास की राजगामी संपदा को लेकर प्रदेश में नई बहस शुरू हो गई है। संत समाज, अखाड़ा परिषद से जुड़े महंतों और वैष्णव समाज के प्रबुद्धजनों ने संयुक्त रूप से मांग की है कि संपदा के अध्यक्ष पद पर वैष्णव समाज के प्रतिनिधि को नियुक्त किया जाए।
ज्ञात हो कि राजा दिग्विजय दास ने वैष्णव संस्कारों के अनुरूप हजारों करोड़ की भूमि, महल और अन्य संपत्तियाँ जनकल्याण के लिए समर्पित की थी। शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना में उनके योगदान को प्रदेशभर में ऐतिहासिक माना जाता है। रायपुर में स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और सड़कों के निर्माण से लेकर राजनांदगांव में बीएनसी कॉटन मिल और विद्युत लाइन जैसी योजनाएँ उनके दूरदर्शी नेतृत्व का प्रमाण हैं।
महंत सुरेंद्र दास ने कहा कि “वैष्णव जन तो तेने कहिए जो पीर पराई जाणे रे” की भावना को राजा दिग्विजय दास ने अपने जीवन में चरितार्थ किया। वहीं, डॉ. सौरव निर्वाणी ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया कि आज तक राजगामी संपदा के अध्यक्ष पद पर कोई वैष्णव समाज का व्यक्ति नियुक्त नहीं हुआ, इसे समाज की भावनाओं की उपेक्षा करार दिया।
संत समाज और महंतों ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय तथा राजनांदगांव के विधायक एवं विधानसभा अध्यक्ष रमन सिंह को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि राजगामी संपदा के अध्यक्ष पद पर वैष्णव समाज से योग्य प्रतिनिधि की नियुक्ति की जाए।
पत्र में कहा गया है कि यह कदम न केवल न्यायसंगत होगा, बल्कि महान वैष्णव परंपरा के प्रति राज्य के सम्मान और संवेदनशीलता का प्रतीक भी बनेगा। संत समाज ने विश्वास व्यक्त किया है कि राज्य सरकार शीघ्र सकारात्मक निर्णय लेकर समाज की भावनाओं का सम्मान करेगी।
