धैचा की हरी खाद से घटेगी यूरिया की खपत, मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ेगी

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राजनांदगांव। खरीफ सीजन की तैयारी के बीच कृषि विभाग किसानों को हरी खाद के रूप में धैचा (सेसबेनिया) के उपयोग के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि धैचा के उपयोग से भूमि की उर्वरता बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया पर निर्भरता कम होती है। इसके लिए किसानों को कुल लागत का 50 प्रतिशत अनुदान देने का भी प्रावधान किया गया है।

कृषि विभाग के अनुसार धैचा एक दलहनी फसल है, जो वायुमंडल से नाइट्रोजन लेकर उसे मिट्टी में स्थिर करती है। इससे भूमि में जैविक कार्बन, नाइट्रोजन और अन्य पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है। साथ ही मिट्टी की संरचना, जलधारण क्षमता और लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता में भी वृद्धि होती है।

विशेषज्ञों ने बताया कि मानसून की शुरुआत में 25 से 30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से धैचा की बुवाई की जाती है। लगभग 35 से 40 दिन बाद, जब पौधे 1 से 1.5 मीटर ऊंचे हो जाएं और फूल आने की प्रारंभिक अवस्था में हों, तब उन्हें खेत में जोतकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। 15 से 20 दिनों में यह सड़-गलकर मिट्टी में मिल जाता है और इसके पोषक तत्व फसलों को उपलब्ध होने लगते हैं।

कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक धैचा के उपयोग से प्रति हेक्टेयर 40 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन उपलब्ध होती है। इतनी नाइट्रोजन प्राप्त करने के लिए सामान्यतः 90 से 130 किलोग्राम यूरिया की जरूरत पड़ती है। इस प्रकार किसान प्रति हेक्टेयर 2 से 3 बोरी यूरिया की बचत कर सकते हैं।

विभाग का कहना है कि धैचा कम लागत वाली, पर्यावरण अनुकूल और मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने वाली हरी खाद है। इसके विपरीत रासायनिक यूरिया का अत्यधिक उपयोग लंबे समय में मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है और प्रदूषण की संभावना भी बढ़ाता है।

किसानों की सुविधा के लिए बीज निगम कार्यालय कौरिनभाठा, राजनांदगांव से धैचा का बीज उपलब्ध कराया जा रहा है। कृषि विभाग ने जिले में प्रचलित धान-गेहूं, धान-चना, धान-सब्जी तथा सोयाबीन आधारित फसल चक्र में धैचा को अपनाने की सलाह दी है। विभाग ने किसानों से संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाकर हरी खादों का अधिकाधिक उपयोग करने की अपील की है, ताकि खेती की लागत कम हो और कृषि उत्पादन को टिकाऊ बनाया जा सके।